मंगलवार, सितंबर 01, 2015

वर्तमान

रात सोयी नहीं है बरसों से,
दिन काम में बिजी है.
अर्थहीन होती हर शाम,
शब्दकोश में दबी है.
आदमी का चक्कर लगाती धरती,
कैलेंडर में फँसी है !

सड़क दौड़ती है घर से,
और सड़कों में उल्झी है.
लब्ज़ों के होंठ सिले हैं,
छत सब में बराबर बटीं है.
शोर में लिपटा गूँगा शहर है,
किरदार बहुत कहानी छोटी है !!

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