गुरुवार, जून 05, 2014

113 वाँ


तुम थी तो मैं था, अब तुम नहीं हो तो कुछ भी नहीं अदिति।
जानती हो आज मैं हमारे पुराने कॉलेज गया था, कैंटीन मे वो लोग मेरा लिखा नाटक प्रैक्टिस कर रहे थे. कुछ देर वहां बैठा कुछ ढूँढ रहा था. जनता था तुम नही हो  वहाँ। फिर शायद मैं  हम दोनों को देख रहा था उन चाय के टूटे कुल्हड़ो मे, समोसे की सॉस मे लिपटी पड़ीं प्लेटें मे।  एक टेबल जिस पर यूँ  दिल बनाया था तुमने,  और उदय- अदिति का नाम गूंथ दिया था  उसमें , वो नाम अब भी पढ़े जा सकते थे अदिति  पर उन पर से दिल का वो निशान मिट गया था.

याद है पहली बार मैंने तुम्हे वहीँ कैंटीन मे देखा था. तुम्हारे लम्बे  खुले बालो की खुशबू जैसे रूम-स्प्रे का काम कर रही थी वहां। मैं वहां बैठा कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था , पर उस समय मेरी सोच की सीमाएं जैसे सिर्फ तुम तक आ कर सिमित हो गयी थी।  तुमने एक नज़र मुझे देखा फिर नज़रें झुका के पढने लगी। वो क्या पढ़ रही थी तुम. " सारा आकाश "....... तुम्हारे सपने बड़े थे अदिति और मैं उन सपनो को पूरा करने के लिए बहुत छोटा।

क्यूँ की थी मुझसे शादी अदिति? ये जानते हुए भी की थिएटर मेरा पहला प्यार है और शायद उसकी जगह मैं तुम्हे कभी  ना दे पाऊँ।  तुम्हारे दोस्तों को जहाँ  तोहफे मे रिंग , गाडी, और फ्लैट्स मिलते थे, मैं बस तुम्हे कुछ लव लेटर्स ही दे सका। हम्म  … तुम्हारी एक बात याद आ गयी।  पिछले साल जब तुम दार्जिलिंग गयी थी ,मैं तुम्हे लगभग रोज़ लेटर्स लिखता था और तुमने आ कर कहा था की मैंने तुम्हे पूरे  112  लेटर्स भेजे थे।  कितनी फ़ास्ट थी तुम  इन नंबर्स मे , 112 लेटर्स , 76 फिल्में , 25 दफा होटल मे  डिनर , 10 साल की फ्लैट की इन्सटॉलमेंटस  , 4 महीने  का  बिजली का   बिल , 140 रुपये मे तीन दिन का खर्च कैसे निकलेगा और एक लड़ाई। हाँ ये काउंट तो मुझे भी याद है , एक  बार लड़ाई। वो शायद इसलिए क्यूंकि हम फिर  कभी मिले ही नहीं। दार्जिलिंग कैसा है अदिति, क्या अब भी उतना ही खूबसूरत और सुहावना ?

तुमने इस फ्लैट को घर बनाया था और मुझसे ये अपेक्षा रखी थी की बस मैं इसे साफ़ रख सकूं। मज़ाक कर रहा  हूँ . तुम्हे मुझसे कितनी ही तो अपेक्षाएं थी और मैं आज तक  किसी पर भी खरा नहीं उतरा। आ कर देखो अदिति अब मैं सिख गया हूँ व्यवस्थित जीना। सिगरेट के टुकड़े तुम्हे अब घर मैं कहीं नहीं मिलेंगे।  टीवी पर तुम्हारी  कोई  फेवारेट फिल्म आती है तो लिखना छोड़ के अब जरूर देखता हूँ। बेडरूम के लिए वो पेंटिंग खरीद  लाया हूँ  जिसे तुमने अमृता शेरगिल की किसी पेंटिंग से कम्पयेर किया था। जानती हो  दम आलू बनाना सिख लिया है तुम्हारे  फेवारेट थे ना , हाँ रोटी गोल नही बनती,  वो तो तुम से भी नहीं बनती थी याद है।

तीन महीने हो गए तुम्हे गए हुए. हिम्मत कर के दार्जीलिंग का टिकेट लाया था पर उस से पहला तुम्हारा साईंन किया हुआ लैटर पहुँच गया।  एक हफ्ता हुआ वो टेबल पर यूँही पड़ा है। सोच रहा हूँ खुद आऊं या इस आखिरी ख़त के साथ तुम्हारा लैटर वापस भेज दूं   साइन कर के।

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