शुक्रवार, मई 20, 2011

गुलदस्ता

छोटे -छोटे मखमली बादलों के ऊपर सोये हुए मैं उडती चली जा रही हूँ . कभी जब बड़े बदलो से टकराती हूँ  तो उसके रूई जैसे टूकड़े हो जाते हैं, जो फिर हवा की भाँती पूरे आसमान में खुशबू बिखेरने लगते हैं . रंग बिरंगे पंछियों के साथ मैं भी गाने लगी हूँ ....समपूर्णता का ये एहसास सुखद है .
अचानक वो महसूस करती है कि एक काला साया उसका पीछा कर रहा है . वो भयभीत है .

डर से उसने आँखें खोल ली हैं . वो अस्पताल के एक पलंग पर पड़ी हैं , पास में दो नुर्स हैं, एक जाकर कमरे का दरवाजा बंद करती है .दरवाजे पर एक शीशे के एक चर्कुंठी खिड़की है, जहाँ से माँ नज़र आ रही है , जो पल्लू से मूँह ढके हुए अपनी नरम नज़रें खिड़की के भीतर जमाये हुए है .उनके कंधे पर बाबा का हाथ है ,जो अब उन्हें वहां से अलग ले जा रहे हैं .

ज्योति ने अब अपना सिर बांयी तरफ़ मोड़ लिया है ..वहां टेबल पर दवाइयों के साथ एक गुलदस्ता है , उसकी नज़रें अब इसके फूलों को निहार रही हैं . वो सोच रही है कि आखिर कितना मुश्किल हैं , इन फूलों में किसी एक फूल को दुसरे से बेहतर बता पाना !नुर्स अब शायद तैयार हैं . " ज्योति घबराना नहीं  साँसे लगातार लेते रहना, बस कुछ ही देर में ऑपरेशन पूरा हो जायेगा. " 
उसने फिर से आँखें बंद कर ली हैं .



आज अचानक ही वो दिन याद आ रहा है , बारवी कक्षा का परिणाम आने वाला था , उन दिनों भी तो मैं इतनी ही घबराई हुई थी. घरवालों के कितनी ही बार समझाने के बाद भी मैंने एक दिन पहले से ही खाना पीना छोड़ दिया था . और उस दिन दोपहर के बारह बजते ही भाई रिजल्ट देखने चला गया था और दरवाजे पर नज़ारे गडाए क्या कुछ तो सोच रही थी मैं. मन में एक अजीब से उलझन और डर था .आज उस छोटी सी ज्योति कि बड़ी बड़ी परेशानियाँ कितनी अर्थहीन मालूम पड़ती है .

शादी के सात साल बाद , वही डर क्या उतना ही मामूली है . अनामिका के जनम से पहले भी तो अम्मा जी ने कहा था , " बहु सुनले हमें तो पहला लड़का ही चाहिए ". उनके रोज़ रोज़ के ताने से मैं कितनी डर गई थी .फिर अनामिका के जनम पर मन में हजारों उथल-पथल चल रही थी.अपने शरीर के उस टुकड़े को निहारने से पहले भी दिल में यही सवाल दबा हुआ तकलीफ दे रहा था , कि जब अम्मा की नज़र इस पर पड़ेगी तो उनके मुह से इस नन्ही से जान के लिए जाने क्या निकलेगा!

बारवी कक्षा के परिणाम आ चूका था और में मूह  फुलाए एक कौने में बैठी थी . माँ ने उस दिन समझाने के लिए कहा था "बेटा  ये पास - फ़ैल होना तुम्हारे हाथ में नही है,जो लिखा होता है वही होता है  " . शायद ये बात उस परीक्षा के  रिजल्ट पर लागू न होती हो ..पर आज लगता है ये बात मैं दुनिया को कैसे समझाऊँ ? क्यूँ औलाद होना किसी परिणाम जैसा हो गया है , लड़का होने पर जीत वाली खुशियाँ मनायी जाती हैं तो लड़की होने पर लोग एक दुसरे को सात्तवना देने लगते हैं . 

अनामिका के जनम के बाद , फिर इन्होने भी तो एक दिन कहा था था , "देखो ज्योति ,हमने फैसला किया था बस दो ही बच्चे .. और अगर इस बार भी लड़की हुई तो .......? बिना लड़के  के तो ज़िन्दगी नहीं कट सकती ...और लड़कियों को ज़िन्दगी भर अपने साथ थोड़े ही साथ रख सकते है" .

समाज चाहे अपने शिक्षित और विकसित होने का कितना ही ढोंग कर ले पर वास्तविकता यही है कि वो आज भी अपनी इस दोगली मानसिकता से ऊपर नहीं उठ पाया है . आज भी बाप अपनी बेटी को भोज समझता है पर वो लड़की अपने पति और अपने घरवालों कि इज्ज़त का भोज पूरी ज़िन्दगी ढोते नहीं थकती.

आज नारी शास्क्तिकरण पर घंटों बोले और निबंध के रूप में ढेरों पन्ने भरे जाते हैं ..पर अगर वाकई वो सब सच है तो हमें जरूरत ही क्यूँ पड़ती है ,आखिर इस विषय पर बोलने या लिखने की?

आज फिर उसके घर में एक लड़की ने जनम लिया है , फूलों से उसका घर अब महकने लगा है ....

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

http://www.guardian.co.uk/world/2011/may/24/india-families-aborting-girl-babies

बेनामी ने कहा…

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