सोमवार, मई 02, 2011

पर तेरा इनकार था !




जैसे समंदर किनारे 
बटोर कर मिट्टी का घर बनाया हो, 
मैंने दो मुट्ठी ख्वाइशों से 
एक ख्वाब सजाया था ,
पर तेरा इनकार था !....
और मेरे ख्वाबों का टूट कर मिट्टी हो जाना!!






ख्वाब किनारे उस रात 
थोड़ी  रेत भी उडी थी ,
जो धूल बन कर उस रात 
इन आंखों पर भी चुभी थी ,
पर तेरा इनकार था !....
और पलकों पर लहरों का तड़प कर बरस जाना !!

               
भयंकर तूफ़ान उमड़ा था 
सन्नाटे के उस शोर में ,
कि दौड़ा था मैं भी 
ख्वाबों का कांच समेटने ,
पर तेरा इनकार था !....
और कांच का दिल चीर कर चूर कर जाना !!  

3 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

वाह ! जी,
इस कविता का तो जवाब नहीं !

संजय भास्कर ने कहा…

वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

संजय भास्कर ने कहा…

आपने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं