शुक्रवार, सितंबर 24, 2010

पुराने पत्थर !!














माटी ही तो हूँ, भीगने पर सील जाता हूँ,


भटकती लहरों के शोर से, कभी इन सांसों मैं तूफ़ान पनप जाता है.

जुगनू सी जलती कभी बूझती, मेरी सफ़लता का जहाज़ गुम जाता है.

बीते पलों की इँटो से बन गयी दीवार, भीतर ढहने लगती है.


रेत के ढेले टटोलता हूँ,तो कुछ पुराने लम्हे हाथों पर चिपक जाते हैं.

कुछ रगींन, कुछ फ़ीकें, कुछ जादूई पलों के शीशे चुभ जाते हैं.

बर्फ़ सा समेटा खून, आँखो से बहने लगता है.


पर माटी ही तो हूँ, भीगने पर सील जाता हूँ,

फिर कोई पुराना पत्थर पड़ने पर टूट जाता हूँ ।