गुरुवार, अगस्त 05, 2010

बिछड़ते पलों का, ये दर्द कैसा है!



बिछड़ते पलों का, ये दर्द कैसा है!

नयी सुबह में, ये अन्धेरा कैसा है!

ये किस सफ़र पर चला हूँ मैं,

मुझे किसकी तलाश है?

दो कदम आगे ही तो,

एक नया मोड है।

हर मोड पर किस्से हज़ारों हैँ ।

हर कहानी का, ये अन्त कैसा है!

बिछड़ते पलों का, ये दर्द कैसा है।


आज भी जब पीछे मुड कर देखता हूँ, तो फिर से उस शहर में पहुँच जाता हूँ, जहाँ से ये बिछड़ने का सिलसिला शुरु हुआ था... मेरा घर, मेरा देहरादून छूट रहा था..इन्जीनियरींग कालेज में दाखिला लेने मुझे एक नये शहर जाना था..घरवालों से जुडी कितनी ही तो यादें हैं, लेकिन आखें बन्द करता हूँ तो खुद को फिर से ट्रेन के डिब्बे में बन्द पाता हूँ और देखता हूँ, मम्मी और पापा को पीछे छूटते हुये..कालेज में हमेशा लगता था कि वे आज भी वहीं मेरा इन्तज़ार कर रहे हैं...


नही जानता था कि ये दिन ज़िन्दगी में फिर आयेगा.. नयी जगह पर नये चेहरों के साथ.. कालेज़ के आखिरी दिन.. एक बार फिर लग रहा था में अपने घर वालों से अलग हो रहा हूँ... किसी दोस्त को स्टेशन तक छोडने जाता तो मन भर आता था.. संग बिताये वो सारे खूबसुरत दिन याद आने लगते ..अब महसूस होता है कि ये चार साल भी कितने कम होते हैं.. सच कहूँ तो मन नही था , कालेज़ , होस्टल के आँगन को छोड़ कर कंही जाने का.. जहाँ मुस्करा के कभी रोकर ,लडकर, झगडकर इस ज़िन्दगी के असली मायने सीखे थे ...


वक्त रूकता नही है, कई मोड़ों से ले जाकर ये फिर हमे एक एसे मोड़ पर खड़ा कर देता है, जहाँ हम फिर किसी से बिछड रहे होते हैं... कलकत्ता में जाब ट्रेनिंग के आखिरी दिन.. दो-दो तीन-तीन कर के लोग पोस्टिंग पा रहे हैं और नयी जगह जा रहे हैं.. वक्त फिर बदल रहा है..मैं फिर एक नयी दिशा में मुड रहा हूँ.. इस शहर में आये तीन ही महीने हूए हैं पर इस से भी एक लगाव हो गया है.. क्यों ये मन इतनी जल्दी रिश्ते जोड लेता है?.. वक्त किसी ऐसी जगह क्यों नही ठहर जाता , जहाँ फिर किसी से बिछडना ना पड़े ...


सवालों के जवाब ढूँढता हूँ तो एक खयाल जहन में आता है... एक छोटा बच्चा जब अचानक ही कंही गिर जाता है, तो वो अपने आस पास देखने लगता है.. अगर वहाँ कोई उसे देख रहा होता है, तो वो रोने लगता है..और अगर वहाँ कोई नही होता , तो वो रोये बिना ही चुप-चाप वहाँ से चला जाता है... तकलीफ़ हमे तब ही होती है जब हम चीज़ों को ओबज़्रव या महसूस करने लगते हैं.. और जब तक हम किसी चीज़ के बारे में नही सोचते, हमे उस से दर्द नही होता.. ज़िन्दगी शायद यही है, हमे हमेशा आगे बढना होता है..पीछे मुडकर देखना शायद हमारे पैर बाँध दे, और हमारी सोच रूक कर हम पर बोझ बन जाये कि मैं अपनी ज़िन्दगी में कुछ नही कर सका ...


सोचता हूँ, अब इस मोड से कुछ सोचे बिना ही आगे चला जाऊँ तो शायद ये बिछडने का गम नही होगा..वैसे भी इस दर्द से बचने का आज मेरे पास और कोई विकल्प भी तो नही...