बुधवार, जून 02, 2010

क्या तुम भुल गयी हो?

मैं कहता था न ...
कि तुम भुल जाओगी !
नहीं रख पाओगी याद,
मुझको एक भी पल ।
कुछ पलों का सही,
हमारा एक साथ तो था...
दो साल हो गये थे,
तुम्हे देखे...
ये कोशिश किये की
तुम बिन ...
कुछ पल तो,
मैं जी सकूँगा,
जब मिलेंगे, तब
तुमसे ये कह सकूँगा ।

तुम जानती हो ना ...
कैसे सम्भाला है मैनें,
तुम बिन ...
तुम से जुड़ी
यहाँ हर चीज़ों को,
कभी इन रूठी गलियों को,
कभी इन नाराज़ मोड़ों को,
और धूप मैं तिलमिलाती
इन उदास सड़कों को,
जिन से होकर तुम
कभी कालेज जाती थी,
ये तेरा
नया पता पूछती थी,
और मैं,
तेरे लौटने कि,
बस ...
एक उम्मीद  भर  दे पाता था ।

तुम जानती हो ना ...
इन किनारे लगे फूलों को
जिन्हे तुम..
प्यार से सहला जाती थीं,
ये गुनगुनाना भुल गये थे।
हवा जब भी बहती थी,
तेरी खुशबू ढूँढती थी।
बारिश जब भी गाती थी,
तेरा वही नाच ढूँढती थी।
कहाँ से लौटाता
इन्हे "तुम"
ये आंखे भी तो
तुम्हे ही ढूँढती थी।
तुम जानती हो ना ...
ये ढाबा,
ये वही है,
जहाँ हम मिलते थे,
हुम्म!!! जानता हुँ,
एकतरफ़ा मिलना भी,
क्या मिलना होता है,
पर जब तुम ...
चाय का प्याला,
अपने होंठ के करीब,
ले जाती थी,
तुम्हारी झुकती पलकों से
मेरी सांसे ...
बातें किया करती थी,
उन पलो को जुगनुँ बनाये,
मैनें आज तक ढाँपे रखा है।

अब जब,
तुम लौट आयी हो,
फिर वंही बैठी हो,
चाय का प्याला लिये,
और मैं...
उतनी ही दूर,
अपने कागज़-कलम लिये,
मैनें,
कभी तुम्हारा नाम नही पुछा,
ना तुम मेरा जान पायी,
पर एक रिश्ता तो था ना ...
बेनाम सही,
और बेनाम रिश्ते
क्या लोग भुल जाते हैं?

क्या तुमने कभी नही देखा
कि ये कौन है?
जो तुमसे मिलने यहाँ
रोज़ आता है,
जो यहाँ सिर्फ़ तुम्हे
देखा करता है,और
जो तब तक नही हिलता
जब तक तुम
चली नही जाती...
एक नज़र भी कभी जो
तुमने मुझे देखा होता,
सच कहता हूँ,
मैं तुम्हे यूँ..
सबकुछ भुलने न देता।
मैं कहता था ना ...
कि तुम भुल जाओगी!
तुम भुल गयी...
!!!....

तुम ..
ये तुम ..
उठ क्यों गयी,
ये तुम .. कहाँ ,
यहाँ कहाँ.. आ रही हो,
मेरी तरफ़ ।।