बुधवार, मई 26, 2010

यादों का दर्द


कागज़ कि बनाई
वो पहली कश्ती याद है,
जिसे चोरी से फ़ाड़ा था
मैथ्स की नोटबुक से,
बहुत रोया था उस दिन,
उसके डूब जाने पर।

स्कूल के रास्ते का
वो पेड याद है,
जिस पर चिड़या का झूँड़
चीं-चीं करता था,
बहुत रोया था उस दिन,
घोंसले के गिर जाने पर।

सड़क के किनारे के,
वो पत्थर याद हैं,
जिनसे निशाने लगाये थे
बगीचे में..
घर कि दीवार के ,
वो कोने याद हैं,
जहाँ दिल बनाया था
तेरे नाम के साथ..
सोने से पहले के
वो किस्से याद हैं,
जो इतने सच थे कि
अब भी नही भुले ..

हर कदम जुडते गये ,
हज़ारों कमज़ोर पल,
जो हमेशा जीते हैं मुझमें ,
उतने ही सजीव उतने ही जीवंत ,

ये वक्त दर्द देता गया,
वक्त मरहम बनता गया ,
सब कहते हैं,
हम बडे हो रहे हैं ।
क्या वाकई ?
क्या तभी ..

अब चाँद
ना छू पाने का
गम नहीं होता..
अब अन्धेरे में
निकलने से
डर नहीं लगता..
क्यों अब भीग जाने पर
बुखार कि चिन्ता नहीं होती
और झूठ बोलने पर
पुराना मज़ा नही आता ।
यादों का दर्द,
शायद जम गया है,
भीतर कँही
महसूस तो होता है ,
पर अब पानी बनकर नही बहता ।।

सोमवार, मई 24, 2010

मैं एक शहर में हूँ ..


फिर घर छोड़ आया हूँ ,
फिर नये रास्तों पे हूँ ,
खुद को तलाश में निकला हूँ मैं,
मैं एक शहर में हूँ ।

ख्वाबों की डोर थामे खड़ा हूँ,
खुले आकाश में उडना चाहता हूँ,
सपनों को सच बनना सीख रहा हूँ मैं,
मैं एक नींद में हूँ ।

कभी दो कदम चलते ही ठहर जाता हूँ,
इस दुनिया कि चमक से शहम जाता हूँ,
अन्धेरे में चलना सीख रहा हूँ मैं,
मैं एक डर में हूँ।

अब खुद से लडने लगा हूँ,
शहर कि गुँज से सुर मिलाने लगा हूँ,
सन्नाटें में गुनगुनाना सीख रहा हूँ मैं,
मैं एक शोर में हूँ।

दोस्तों की बातें लगने लगी है,
जीतने की जिद बढ़ने लगी है,
चेहरे पे मुखोटा लगाना सीख रहा हूँ मैं,
मैं एक भीड में हूँ।

अब मुझे भूख ज्यादा लगती है,
अब धूप भी ज्यादा चूभती है,
हँस के तन्हा जीना सीख रहा हूँ मैं,
मैं एक दर्द में हूँ।।