गुरुवार, अक्तूबर 21, 2010

अल्पविराम



                                                                               ( 1 )                  

काँच टूटने की एक जोरदार आवाज़ और वो अपनी दुनिया से बाहर आ गयी . शायद विनोद जग गयें हैं . बेडरूम अब भी वैसा ही है , जैसा वो कल रात छोड़ कर गयी थी . बिस्तर की टूटी सिलवटों के बीच विनोद मांश के लोथड़े जैसा पड़ा है . फर्श गीला है और शराब की गंध से महक रहा है . बोतलों का टूटा कांच दांत निकाले चिंघाड़ रहा है . पर कमरे में घोर शान्ति फ़ैली हुई है , जैसी अक्सर किसी युद्ध के बाद होती है ,जिसका शोर अब भी दीवारों के बीच गूँज रहा है , वो छटपटा रही है . उसने कमरे की खिडकी खोल दी है .



वैसे तो भोर हुए कुछ घंटे हो चुके हैं , पर फिजा में अँधेरा अब भी बिखरा हुआ है , आसमान में बादल आज पूरे मूड में हैं, सुबह से ही पानी गले तक भर के जोर जोर से गरारा कर रहे हैं . शीतल पवन की मदिरा में मदहोश हो कर पेड़ झूम रहे हैं . मौसम का ये रंग देख कर उसकी नज़र खिडकी के बाहर ही टिक गयी है . वो भी उड़ना चाहती है , उन पत्तों की तरह जो बिना किसी दबाव के किसी अन्जान डगर को बहे चले जा रहे हैं , वो उन कदमो का पीछा करना चाहती है , जो रेनकोट लटकाये, स्कूल-बेग़ टाँगे पानी पर अपने निशान छोड़े जा रहे हैं . शायद , विनोद ने उसकी आहट महसूस कर ली है, आंखे खोले बिना ही वो कुछ बडबडा रहा है .


" कहाँ थी तुम निशा ?, मैं कब से तुम्हे ढूंढ रहा था !....तुम जानती हो न.. सुबह उठकर के सबसे पहले , ये आँखे बस, तुम्हे ही देखना चाहती हैं . "


उसके चेहरे के लकीरों पर कोई फरक नही आया है , वो बिस्तर की तह लगाने में जुटी है .
" सुबह के 9 बजने को आये हैं , अब उठ जाईये ...तुम्हे ऑफिस के लिए लेट हो रहा होगा. " रोमांटिक अंदाज़ में विनोद , उसके हाथ खींच कर अपने पास ले आया .


 आसमान   ने   अपना   दिल  खोल   दिया   है , और   बूंदे   बादलों   का   गीत     गाते   हुए    ज़मीन   चूमने लगी   है .


" निशा, क्यों नाराज़ रहती हो मुझसे? मैं आज भी तुम्हे पहले जैसा ही प्यार करता हूँ , और हमेशा करता रहूँगा , हमारे प्यार के बीच कभी कोई नहीं आएगा ."  उसने अपने हाथ खींच लिये, पर एक घाव है जो उसके हाथ पर है , जो कुछ ही घंटे पुराना लगता है.


"ये कैसा हुआ निशा ? तुम्हे तकलीफ होती होगी , तुम बैठो , मैं अभी डेटोल ले के आता हूँ , मैं तुम्हे कोई दर्द नहीं होने दूंगा "


विनोद कमरे से बाहर चला गया है. खिडकी के पार बारिश जोर पकड़ने लगी है .
वो मूक काया बनी बैठी है . वो जानती है कि , कुछ ही देर में विनोद को होश आ गया होगा , और वो विनोद, जो अभी इस कमरे से गया है , वो वापस नही आने वाला . बादल कर्हाने लगे हैं , पानी फूटता जा रहा है .


                                                                ( 2 )


" मैंने तुम्हे कितनी बार कहा है , मेरी चीज़ों को हाथ मत लगाया करो , अपना ख्याल मैं खुद रख सकता हूँ .... आईंदा  मेरे कपडे धोने कि तुम्हे कोई जरूरत नहीं! "


विनोद ऑफिस के लिए तैयार है .हाथ का घाव जो  विनोद के खींचने से अचानक उभर आया था , वो अब चीस मारने लगा है , और अब उसकी  ये बातें सुनकर वो अपने दर्द बढ़ाना नहीं चाहती . वो ज़मीन पर से कांच साफ़ करने में लग गयी है . ज़िंदगी भी अजीब है , जहाँ हमें चोट लगती है , अक्सर हम वहीँ उसका मरहम ढूँढने लगते हैं . आसमान जितना रंग  बदल रहा है , बादल उतने ही  काले हो रहे हैं .

" बाहर बारिश तेज़ है , रूक जाइए,  हलकी होने पर चले जाएगा ."   धीरे धीरे विनोद के कदमो का शोर कमरे से दूर चला गया .

अंजलि मध्यमवर्गीय परिवार से हैं , जहाँ एक बाप ने बड़ी कोशिशों के बाद अपनी लड़की को  उम्मीदों और सपनो के साथ  विनोद के घरवालों को सौंपा था. विनोद के किसी भी सवाल का जवाब देने से पहले अपने बाबा का चेहरा उसके ज़हन में घूम जाता है . पर एक दिन तो विनोद से  वो भी पूछने चाहती है, आखिर ऐसा क्यों किया हुआ  उसके साथ?    निशा आज भी विनोद कि ज़िन्दगी है ,जिसने उसे ठुकरा के किसी और से शादी कर ली  और जिसकी  जगह विनोद कि ज़िन्दगी में, अंजलि कभी नहीं ले पायी . अगर वो निशा के प्यार को नहीं भुला सकता था, तो उसने अपने प्यार कि चिता में अंजलि की  खुशियाँ कि क्यों जला दी . वो आज तक  ये सब नहीं पूछ पायी क्योंकि उसे अभी भी लगता है कि एक दिन तो उसका विनोद लौट आएगा और बादल अपना रंग बदल लेंगे , जब सोने सी रौशनी के साथ सूरज एक नयी सुबह लेकर उसके दरवाजे पर दस्तक देगा .



                                                              (  3 )


रात के ग्यारह  बजे हैं , विनोद ऑफिस से घर लौट आया है . अंजलि बिस्तर पर बैठी किताब पढ़ रही है . गम के अलावा भी ज़िन्दगी के कई रंग है , जिन्हें वो किताबों में ढूँढा करती है  . खिड़की से बारिश का शोर आ रहा है , जो अब धीमा हो गया है पर  जिसने माहौल को अभी भी जिवित् रखा हुआ है .

विनोद ने बोतल खोल ली है .

" क्या पढ़ रही हो ?"

" मैं फ़ोन कर रहा था तुम्हे दिन में , उठाया क्यों नहीं  ?  "

" तुम ये स्कूल का चक्कर छोड़ क्यों नहीं देती......?

"खाने में कुछ रखा है क्या ? आज बारिश की वजह से सालों ने  दूकानें नहीं खोली "
वैसे तो हर दिन इन सवालों का जवाब हाँ या ना! में दे देती है, जो जल्दी ही एकतरफा युद्द में बदल जाता है , पर आज उसने किताब से नज़र ऊपर नहीं  उठाई ..दरअसल आज उसने उसकी बातें सुनने कि कोई परवाह नही की  ..

पर आज मौसम कुछ ज्यादा ही ख़राब है . बारिश लगभग अपने अंतिम चरण में है . नशे और गुस्से में विनोद ने आधी  खाली की  बोतल अंजलि की  किताब पर दे मारी . जो आज अपना निशाना नहीं चुकी . बोतल के  चीथड़े के साथ किताब ज़मीन पर गिर गयी है .कांच का रंग अब लाल  हो गया है .

अब बारिश ने अँधेरे का साथ छोड़ दिया है  और बादल दूर चले गए हैं ,  लगता है,  अब ये जल्दी  वापस नही आने वाले .

शुक्रवार, सितंबर 24, 2010

पुराने पत्थर !!














माटी ही तो हूँ, भीगने पर सील जाता हूँ,


भटकती लहरों के शोर से, कभी इन सांसों मैं तूफ़ान पनप जाता है.

जुगनू सी जलती कभी बूझती, मेरी सफ़लता का जहाज़ गुम जाता है.

बीते पलों की इँटो से बन गयी दीवार, भीतर ढहने लगती है.


रेत के ढेले टटोलता हूँ,तो कुछ पुराने लम्हे हाथों पर चिपक जाते हैं.

कुछ रगींन, कुछ फ़ीकें, कुछ जादूई पलों के शीशे चुभ जाते हैं.

बर्फ़ सा समेटा खून, आँखो से बहने लगता है.


पर माटी ही तो हूँ, भीगने पर सील जाता हूँ,

फिर कोई पुराना पत्थर पड़ने पर टूट जाता हूँ ।

गुरुवार, अगस्त 05, 2010

बिछड़ते पलों का, ये दर्द कैसा है!



बिछड़ते पलों का, ये दर्द कैसा है!

नयी सुबह में, ये अन्धेरा कैसा है!

ये किस सफ़र पर चला हूँ मैं,

मुझे किसकी तलाश है?

दो कदम आगे ही तो,

एक नया मोड है।

हर मोड पर किस्से हज़ारों हैँ ।

हर कहानी का, ये अन्त कैसा है!

बिछड़ते पलों का, ये दर्द कैसा है।


आज भी जब पीछे मुड कर देखता हूँ, तो फिर से उस शहर में पहुँच जाता हूँ, जहाँ से ये बिछड़ने का सिलसिला शुरु हुआ था... मेरा घर, मेरा देहरादून छूट रहा था..इन्जीनियरींग कालेज में दाखिला लेने मुझे एक नये शहर जाना था..घरवालों से जुडी कितनी ही तो यादें हैं, लेकिन आखें बन्द करता हूँ तो खुद को फिर से ट्रेन के डिब्बे में बन्द पाता हूँ और देखता हूँ, मम्मी और पापा को पीछे छूटते हुये..कालेज में हमेशा लगता था कि वे आज भी वहीं मेरा इन्तज़ार कर रहे हैं...


नही जानता था कि ये दिन ज़िन्दगी में फिर आयेगा.. नयी जगह पर नये चेहरों के साथ.. कालेज़ के आखिरी दिन.. एक बार फिर लग रहा था में अपने घर वालों से अलग हो रहा हूँ... किसी दोस्त को स्टेशन तक छोडने जाता तो मन भर आता था.. संग बिताये वो सारे खूबसुरत दिन याद आने लगते ..अब महसूस होता है कि ये चार साल भी कितने कम होते हैं.. सच कहूँ तो मन नही था , कालेज़ , होस्टल के आँगन को छोड़ कर कंही जाने का.. जहाँ मुस्करा के कभी रोकर ,लडकर, झगडकर इस ज़िन्दगी के असली मायने सीखे थे ...


वक्त रूकता नही है, कई मोड़ों से ले जाकर ये फिर हमे एक एसे मोड़ पर खड़ा कर देता है, जहाँ हम फिर किसी से बिछड रहे होते हैं... कलकत्ता में जाब ट्रेनिंग के आखिरी दिन.. दो-दो तीन-तीन कर के लोग पोस्टिंग पा रहे हैं और नयी जगह जा रहे हैं.. वक्त फिर बदल रहा है..मैं फिर एक नयी दिशा में मुड रहा हूँ.. इस शहर में आये तीन ही महीने हूए हैं पर इस से भी एक लगाव हो गया है.. क्यों ये मन इतनी जल्दी रिश्ते जोड लेता है?.. वक्त किसी ऐसी जगह क्यों नही ठहर जाता , जहाँ फिर किसी से बिछडना ना पड़े ...


सवालों के जवाब ढूँढता हूँ तो एक खयाल जहन में आता है... एक छोटा बच्चा जब अचानक ही कंही गिर जाता है, तो वो अपने आस पास देखने लगता है.. अगर वहाँ कोई उसे देख रहा होता है, तो वो रोने लगता है..और अगर वहाँ कोई नही होता , तो वो रोये बिना ही चुप-चाप वहाँ से चला जाता है... तकलीफ़ हमे तब ही होती है जब हम चीज़ों को ओबज़्रव या महसूस करने लगते हैं.. और जब तक हम किसी चीज़ के बारे में नही सोचते, हमे उस से दर्द नही होता.. ज़िन्दगी शायद यही है, हमे हमेशा आगे बढना होता है..पीछे मुडकर देखना शायद हमारे पैर बाँध दे, और हमारी सोच रूक कर हम पर बोझ बन जाये कि मैं अपनी ज़िन्दगी में कुछ नही कर सका ...


सोचता हूँ, अब इस मोड से कुछ सोचे बिना ही आगे चला जाऊँ तो शायद ये बिछडने का गम नही होगा..वैसे भी इस दर्द से बचने का आज मेरे पास और कोई विकल्प भी तो नही...

शनिवार, जुलाई 31, 2010

तुम्हारे जन्मदिन पर ...

कभी मुस्कराना ,कभी गुनगुनाना यूँ ही बेवजह नाच पड़ना...
क्योँ तेरी कुछ चीजें मुझे अच्छी नहीं लगती ।।

जैसा जहर में डूबा हुआ, निवाला निगल लिया हो...
क्योँ तेरी हर बात मुझे अच्छी नहीं लगती ।।

पन्नों में दबे फूल, मेरी किताब से गायब हैं...
क्योँ तेरी हर आदत मुझे अच्छी नहीं लगती ।।

दीवार पर लिख कर, मिटा देता हूँ तेरा नाम...
क्योँ तेरी हर तसवीर मुझे अच्छी नहीं लगती ।।

कहते हैं,लम्हों में कट जाता है सदियोँ का सफ़र...
क्योँ उस रात के बाद कोई सुबह अच्छी नही लगती।।

बुधवार, जून 02, 2010

क्या तुम भुल गयी हो?

मैं कहता था न ...
कि तुम भुल जाओगी !
नहीं रख पाओगी याद,
मुझको एक भी पल ।
कुछ पलों का सही,
हमारा एक साथ तो था...
दो साल हो गये थे,
तुम्हे देखे...
ये कोशिश किये की
तुम बिन ...
कुछ पल तो,
मैं जी सकूँगा,
जब मिलेंगे, तब
तुमसे ये कह सकूँगा ।

तुम जानती हो ना ...
कैसे सम्भाला है मैनें,
तुम बिन ...
तुम से जुड़ी
यहाँ हर चीज़ों को,
कभी इन रूठी गलियों को,
कभी इन नाराज़ मोड़ों को,
और धूप मैं तिलमिलाती
इन उदास सड़कों को,
जिन से होकर तुम
कभी कालेज जाती थी,
ये तेरा
नया पता पूछती थी,
और मैं,
तेरे लौटने कि,
बस ...
एक उम्मीद  भर  दे पाता था ।

तुम जानती हो ना ...
इन किनारे लगे फूलों को
जिन्हे तुम..
प्यार से सहला जाती थीं,
ये गुनगुनाना भुल गये थे।
हवा जब भी बहती थी,
तेरी खुशबू ढूँढती थी।
बारिश जब भी गाती थी,
तेरा वही नाच ढूँढती थी।
कहाँ से लौटाता
इन्हे "तुम"
ये आंखे भी तो
तुम्हे ही ढूँढती थी।
तुम जानती हो ना ...
ये ढाबा,
ये वही है,
जहाँ हम मिलते थे,
हुम्म!!! जानता हुँ,
एकतरफ़ा मिलना भी,
क्या मिलना होता है,
पर जब तुम ...
चाय का प्याला,
अपने होंठ के करीब,
ले जाती थी,
तुम्हारी झुकती पलकों से
मेरी सांसे ...
बातें किया करती थी,
उन पलो को जुगनुँ बनाये,
मैनें आज तक ढाँपे रखा है।

अब जब,
तुम लौट आयी हो,
फिर वंही बैठी हो,
चाय का प्याला लिये,
और मैं...
उतनी ही दूर,
अपने कागज़-कलम लिये,
मैनें,
कभी तुम्हारा नाम नही पुछा,
ना तुम मेरा जान पायी,
पर एक रिश्ता तो था ना ...
बेनाम सही,
और बेनाम रिश्ते
क्या लोग भुल जाते हैं?

क्या तुमने कभी नही देखा
कि ये कौन है?
जो तुमसे मिलने यहाँ
रोज़ आता है,
जो यहाँ सिर्फ़ तुम्हे
देखा करता है,और
जो तब तक नही हिलता
जब तक तुम
चली नही जाती...
एक नज़र भी कभी जो
तुमने मुझे देखा होता,
सच कहता हूँ,
मैं तुम्हे यूँ..
सबकुछ भुलने न देता।
मैं कहता था ना ...
कि तुम भुल जाओगी!
तुम भुल गयी...
!!!....

तुम ..
ये तुम ..
उठ क्यों गयी,
ये तुम .. कहाँ ,
यहाँ कहाँ.. आ रही हो,
मेरी तरफ़ ।।

बुधवार, मई 26, 2010

यादों का दर्द


कागज़ कि बनाई
वो पहली कश्ती याद है,
जिसे चोरी से फ़ाड़ा था
मैथ्स की नोटबुक से,
बहुत रोया था उस दिन,
उसके डूब जाने पर।

स्कूल के रास्ते का
वो पेड याद है,
जिस पर चिड़या का झूँड़
चीं-चीं करता था,
बहुत रोया था उस दिन,
घोंसले के गिर जाने पर।

सड़क के किनारे के,
वो पत्थर याद हैं,
जिनसे निशाने लगाये थे
बगीचे में..
घर कि दीवार के ,
वो कोने याद हैं,
जहाँ दिल बनाया था
तेरे नाम के साथ..
सोने से पहले के
वो किस्से याद हैं,
जो इतने सच थे कि
अब भी नही भुले ..

हर कदम जुडते गये ,
हज़ारों कमज़ोर पल,
जो हमेशा जीते हैं मुझमें ,
उतने ही सजीव उतने ही जीवंत ,

ये वक्त दर्द देता गया,
वक्त मरहम बनता गया ,
सब कहते हैं,
हम बडे हो रहे हैं ।
क्या वाकई ?
क्या तभी ..

अब चाँद
ना छू पाने का
गम नहीं होता..
अब अन्धेरे में
निकलने से
डर नहीं लगता..
क्यों अब भीग जाने पर
बुखार कि चिन्ता नहीं होती
और झूठ बोलने पर
पुराना मज़ा नही आता ।
यादों का दर्द,
शायद जम गया है,
भीतर कँही
महसूस तो होता है ,
पर अब पानी बनकर नही बहता ।।

सोमवार, मई 24, 2010

मैं एक शहर में हूँ ..


फिर घर छोड़ आया हूँ ,
फिर नये रास्तों पे हूँ ,
खुद को तलाश में निकला हूँ मैं,
मैं एक शहर में हूँ ।

ख्वाबों की डोर थामे खड़ा हूँ,
खुले आकाश में उडना चाहता हूँ,
सपनों को सच बनना सीख रहा हूँ मैं,
मैं एक नींद में हूँ ।

कभी दो कदम चलते ही ठहर जाता हूँ,
इस दुनिया कि चमक से शहम जाता हूँ,
अन्धेरे में चलना सीख रहा हूँ मैं,
मैं एक डर में हूँ।

अब खुद से लडने लगा हूँ,
शहर कि गुँज से सुर मिलाने लगा हूँ,
सन्नाटें में गुनगुनाना सीख रहा हूँ मैं,
मैं एक शोर में हूँ।

दोस्तों की बातें लगने लगी है,
जीतने की जिद बढ़ने लगी है,
चेहरे पे मुखोटा लगाना सीख रहा हूँ मैं,
मैं एक भीड में हूँ।

अब मुझे भूख ज्यादा लगती है,
अब धूप भी ज्यादा चूभती है,
हँस के तन्हा जीना सीख रहा हूँ मैं,
मैं एक दर्द में हूँ।।