शनिवार, जनवरी 12, 2008

शोर......

कभी कभी मैं,हर कंही एक शोर सुनता हूँ.
जो चीजे कह नही सकती उनकी चीख हर बार सुनता हूँ॥

बरसती बूंदे बारिश कि गज़ब सा शोर करती है।
वो आवाज आंखो से बहते पानी का करुन्द संगीत लगती है॥

सूरज कि रौशनी से भी आती एक आह लगती है.
सुनना चाहता हूँ मुझे बस धुप लगती है॥

जब खुद मैं मचलते शब्दों को कविता का रुप देता हूँ।
उलझते शब्दों का कर्हाना हर बार सुनता हूँ..