मंगलवार, सितंबर 01, 2015

वर्तमान

रात सोयी नहीं है बरसों से,
दिन काम में बिजी है.
अर्थहीन होती हर शाम,
शब्दकोश में दबी है.
आदमी का चक्कर लगाती धरती,
कैलेंडर में फँसी है !

सड़क दौड़ती है घर से,
और सड़कों में उल्झी है.
लब्ज़ों के होंठ सिले हैं,
छत सब में बराबर बटीं है.
शोर में लिपटा गूँगा शहर है,
किरदार बहुत कहानी छोटी है !!

गुरुवार, जून 05, 2014

113 वाँ


तुम थी तो मैं था, अब तुम नहीं हो तो कुछ भी नहीं अदिति।
जानती हो आज मैं हमारे पुराने कॉलेज गया था, कैंटीन मे वो लोग मेरा लिखा नाटक प्रैक्टिस कर रहे थे. कुछ देर वहां बैठा कुछ ढूँढ रहा था. जनता था तुम नही हो  वहाँ। फिर शायद मैं  हम दोनों को देख रहा था उन चाय के टूटे कुल्हड़ो मे, समोसे की सॉस मे लिपटी पड़ीं प्लेटें मे।  एक टेबल जिस पर यूँ  दिल बनाया था तुमने,  और उदय- अदिति का नाम गूंथ दिया था  उसमें , वो नाम अब भी पढ़े जा सकते थे अदिति  पर उन पर से दिल का वो निशान मिट गया था.

याद है पहली बार मैंने तुम्हे वहीँ कैंटीन मे देखा था. तुम्हारे लम्बे  खुले बालो की खुशबू जैसे रूम-स्प्रे का काम कर रही थी वहां। मैं वहां बैठा कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था , पर उस समय मेरी सोच की सीमाएं जैसे सिर्फ तुम तक आ कर सिमित हो गयी थी।  तुमने एक नज़र मुझे देखा फिर नज़रें झुका के पढने लगी। वो क्या पढ़ रही थी तुम. " सारा आकाश "....... तुम्हारे सपने बड़े थे अदिति और मैं उन सपनो को पूरा करने के लिए बहुत छोटा।

क्यूँ की थी मुझसे शादी अदिति? ये जानते हुए भी की थिएटर मेरा पहला प्यार है और शायद उसकी जगह मैं तुम्हे कभी  ना दे पाऊँ।  तुम्हारे दोस्तों को जहाँ  तोहफे मे रिंग , गाडी, और फ्लैट्स मिलते थे, मैं बस तुम्हे कुछ लव लेटर्स ही दे सका। हम्म  … तुम्हारी एक बात याद आ गयी।  पिछले साल जब तुम दार्जिलिंग गयी थी ,मैं तुम्हे लगभग रोज़ लेटर्स लिखता था और तुमने आ कर कहा था की मैंने तुम्हे पूरे  112  लेटर्स भेजे थे।  कितनी फ़ास्ट थी तुम  इन नंबर्स मे , 112 लेटर्स , 76 फिल्में , 25 दफा होटल मे  डिनर , 10 साल की फ्लैट की इन्सटॉलमेंटस  , 4 महीने  का  बिजली का   बिल , 140 रुपये मे तीन दिन का खर्च कैसे निकलेगा और एक लड़ाई। हाँ ये काउंट तो मुझे भी याद है , एक  बार लड़ाई। वो शायद इसलिए क्यूंकि हम फिर  कभी मिले ही नहीं। दार्जिलिंग कैसा है अदिति, क्या अब भी उतना ही खूबसूरत और सुहावना ?

तुमने इस फ्लैट को घर बनाया था और मुझसे ये अपेक्षा रखी थी की बस मैं इसे साफ़ रख सकूं। मज़ाक कर रहा  हूँ . तुम्हे मुझसे कितनी ही तो अपेक्षाएं थी और मैं आज तक  किसी पर भी खरा नहीं उतरा। आ कर देखो अदिति अब मैं सिख गया हूँ व्यवस्थित जीना। सिगरेट के टुकड़े तुम्हे अब घर मैं कहीं नहीं मिलेंगे।  टीवी पर तुम्हारी  कोई  फेवारेट फिल्म आती है तो लिखना छोड़ के अब जरूर देखता हूँ। बेडरूम के लिए वो पेंटिंग खरीद  लाया हूँ  जिसे तुमने अमृता शेरगिल की किसी पेंटिंग से कम्पयेर किया था। जानती हो  दम आलू बनाना सिख लिया है तुम्हारे  फेवारेट थे ना , हाँ रोटी गोल नही बनती,  वो तो तुम से भी नहीं बनती थी याद है।

तीन महीने हो गए तुम्हे गए हुए. हिम्मत कर के दार्जीलिंग का टिकेट लाया था पर उस से पहला तुम्हारा साईंन किया हुआ लैटर पहुँच गया।  एक हफ्ता हुआ वो टेबल पर यूँही पड़ा है। सोच रहा हूँ खुद आऊं या इस आखिरी ख़त के साथ तुम्हारा लैटर वापस भेज दूं   साइन कर के।

शुक्रवार, मई 20, 2011

गुलदस्ता

छोटे -छोटे मखमली बादलों के ऊपर सोये हुए मैं उडती चली जा रही हूँ . कभी जब बड़े बदलो से टकराती हूँ  तो उसके रूई जैसे टूकड़े हो जाते हैं, जो फिर हवा की भाँती पूरे आसमान में खुशबू बिखेरने लगते हैं . रंग बिरंगे पंछियों के साथ मैं भी गाने लगी हूँ ....समपूर्णता का ये एहसास सुखद है .
अचानक वो महसूस करती है कि एक काला साया उसका पीछा कर रहा है . वो भयभीत है .

डर से उसने आँखें खोल ली हैं . वो अस्पताल के एक पलंग पर पड़ी हैं , पास में दो नुर्स हैं, एक जाकर कमरे का दरवाजा बंद करती है .दरवाजे पर एक शीशे के एक चर्कुंठी खिड़की है, जहाँ से माँ नज़र आ रही है , जो पल्लू से मूँह ढके हुए अपनी नरम नज़रें खिड़की के भीतर जमाये हुए है .उनके कंधे पर बाबा का हाथ है ,जो अब उन्हें वहां से अलग ले जा रहे हैं .

ज्योति ने अब अपना सिर बांयी तरफ़ मोड़ लिया है ..वहां टेबल पर दवाइयों के साथ एक गुलदस्ता है , उसकी नज़रें अब इसके फूलों को निहार रही हैं . वो सोच रही है कि आखिर कितना मुश्किल हैं , इन फूलों में किसी एक फूल को दुसरे से बेहतर बता पाना !नुर्स अब शायद तैयार हैं . " ज्योति घबराना नहीं  साँसे लगातार लेते रहना, बस कुछ ही देर में ऑपरेशन पूरा हो जायेगा. " 
उसने फिर से आँखें बंद कर ली हैं .



आज अचानक ही वो दिन याद आ रहा है , बारवी कक्षा का परिणाम आने वाला था , उन दिनों भी तो मैं इतनी ही घबराई हुई थी. घरवालों के कितनी ही बार समझाने के बाद भी मैंने एक दिन पहले से ही खाना पीना छोड़ दिया था . और उस दिन दोपहर के बारह बजते ही भाई रिजल्ट देखने चला गया था और दरवाजे पर नज़ारे गडाए क्या कुछ तो सोच रही थी मैं. मन में एक अजीब से उलझन और डर था .आज उस छोटी सी ज्योति कि बड़ी बड़ी परेशानियाँ कितनी अर्थहीन मालूम पड़ती है .

शादी के सात साल बाद , वही डर क्या उतना ही मामूली है . अनामिका के जनम से पहले भी तो अम्मा जी ने कहा था , " बहु सुनले हमें तो पहला लड़का ही चाहिए ". उनके रोज़ रोज़ के ताने से मैं कितनी डर गई थी .फिर अनामिका के जनम पर मन में हजारों उथल-पथल चल रही थी.अपने शरीर के उस टुकड़े को निहारने से पहले भी दिल में यही सवाल दबा हुआ तकलीफ दे रहा था , कि जब अम्मा की नज़र इस पर पड़ेगी तो उनके मुह से इस नन्ही से जान के लिए जाने क्या निकलेगा!

बारवी कक्षा के परिणाम आ चूका था और में मूह  फुलाए एक कौने में बैठी थी . माँ ने उस दिन समझाने के लिए कहा था "बेटा  ये पास - फ़ैल होना तुम्हारे हाथ में नही है,जो लिखा होता है वही होता है  " . शायद ये बात उस परीक्षा के  रिजल्ट पर लागू न होती हो ..पर आज लगता है ये बात मैं दुनिया को कैसे समझाऊँ ? क्यूँ औलाद होना किसी परिणाम जैसा हो गया है , लड़का होने पर जीत वाली खुशियाँ मनायी जाती हैं तो लड़की होने पर लोग एक दुसरे को सात्तवना देने लगते हैं . 

अनामिका के जनम के बाद , फिर इन्होने भी तो एक दिन कहा था था , "देखो ज्योति ,हमने फैसला किया था बस दो ही बच्चे .. और अगर इस बार भी लड़की हुई तो .......? बिना लड़के  के तो ज़िन्दगी नहीं कट सकती ...और लड़कियों को ज़िन्दगी भर अपने साथ थोड़े ही साथ रख सकते है" .

समाज चाहे अपने शिक्षित और विकसित होने का कितना ही ढोंग कर ले पर वास्तविकता यही है कि वो आज भी अपनी इस दोगली मानसिकता से ऊपर नहीं उठ पाया है . आज भी बाप अपनी बेटी को भोज समझता है पर वो लड़की अपने पति और अपने घरवालों कि इज्ज़त का भोज पूरी ज़िन्दगी ढोते नहीं थकती.

आज नारी शास्क्तिकरण पर घंटों बोले और निबंध के रूप में ढेरों पन्ने भरे जाते हैं ..पर अगर वाकई वो सब सच है तो हमें जरूरत ही क्यूँ पड़ती है ,आखिर इस विषय पर बोलने या लिखने की?

आज फिर उसके घर में एक लड़की ने जनम लिया है , फूलों से उसका घर अब महकने लगा है ....

सोमवार, मई 02, 2011

पर तेरा इनकार था !




जैसे समंदर किनारे 
बटोर कर मिट्टी का घर बनाया हो, 
मैंने दो मुट्ठी ख्वाइशों से 
एक ख्वाब सजाया था ,
पर तेरा इनकार था !....
और मेरे ख्वाबों का टूट कर मिट्टी हो जाना!!






ख्वाब किनारे उस रात 
थोड़ी  रेत भी उडी थी ,
जो धूल बन कर उस रात 
इन आंखों पर भी चुभी थी ,
पर तेरा इनकार था !....
और पलकों पर लहरों का तड़प कर बरस जाना !!

               
भयंकर तूफ़ान उमड़ा था 
सन्नाटे के उस शोर में ,
कि दौड़ा था मैं भी 
ख्वाबों का कांच समेटने ,
पर तेरा इनकार था !....
और कांच का दिल चीर कर चूर कर जाना !!